लबोटा, अपने संरक्षक स्वामी डोलडाल को सुर्खियों में कैसे लाया ?



 मंदाकिनी नदी के किनारे चित्रकूट वन में एक बूढ़ी, बदसूरत और गरीब औरत रहती थी। वह बहुत ही दयालु और उदार स्वभाव की थी, लेकिन उसकी बदसूरती के कारण वहाँ के लोग उसे पसंद नहीं करते और कुटिल भाव से उसे कुरूपा बुलाते थे। अपने साथ इतने अधिक भेदभाव और घृणा के कारण वह नदी के किनारे प्रायः एकांत में बैठी रहती थी। एक दिन कल्पतारा नामक एक साधू नदी किनारे पानी पीने आये हुए थे कि अचानक एक शिकारी की गलती से हिरण के जगह स्वयं शिकार बन गये। बूढ़ी कुरूपा कुछ दूरी पर बैठे ये सब देख रही थी। साधू को आहत देख दौड़कर उनकी मदद के लिए आई। वह उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर ले गई, पानी पिलाया और उनका आवश्यक उपचार करने में जुट गई, लेकिन साधू कल्पतारा ने बताया कि उनका अंतिम समय आ चुका है, इसलिए परेशान ना होने का आश्वासन दिया और कुरूपा की सेवा से प्रसन्न होकर कल्पतारा ने उसे बताया कि वह भविष्य में लबनिका अप्सरा के रूप में अपने कोमल वाणी और सुन्दरता के लिए काफी सराही जायेगी साथ ही अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने ने यह भी कहा कि उसका पुर्नजन्म भगवान इंद्र के राजदरबार में होगा। इन वरदानों को देकर कल्पतारा चल बसे। कुरूपा को अंततः उदारता को प्राप्त हुई। कल्पतारा से वरदान मिलने के बाद कुरूपा ने अपने आत्मा का शरीर से त्याग केवल इस वजह से किया जिससे कि बिना किसी रूकावट के उसका पुनर्जन्म भगवान इन्द्र के राजदरबार में लबनिका के रूप में हो जाये। लबनिका इन्द्रदरबार में दूसरी अप्सराओं की तुलना में सुंदर होने के साथ-साथ उसकी वाणी में भी मधुरता थी। वह साम्राज्य की पहचान थी और उसकी आवाज ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। लेकिन सुंदरता और मधुर वाणी की वजह से उसमें अहंकार आ चुका था जो कि समय के साथ बढ़ता ही चला गया। वह उन सभी का मजाक उड़ाती जिन्हें वो सम्मान योग्य नहीं मानती। एक दिन, जब वह गंगोत्री नदी के किनारे विहार कर रही थी तो उसे ऋषि चंद्रकेतु दिखाई दिये। अपनी स्वभाव के अनुरूप उनका सम्मान न करके, उन्हें लज्जित करना चाहा। उसने न केवल ऋषि का मजाक उड़ाया बल्कि उनकी साधना में भी व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की। इस अभद्र आचरण से परेशान होकर ऋषि चंद्रकेतु ने उसे यथोचित श्राप दिया। उसके सुंदर शरीर को श्रापित तोते में बदलकर ऋषि ने उसके अहंकार को दंडित किया जिससे उसकी सुंदरता और मधुर वाणी क्षणभर में धुआँ के समान ओझल हो गई। श्रापित होने से लबनिका अपने अतीत के बारे में भूल चुकी थी, जिसमें उसका राजदरबार के अप्सरा से लेकर ऋषि चन्द्रकेतु द्वारा श्रापित तोते तक का सफर शामिल था। उसका जीवन तब और अंधकारमय हो गया जब एक ज्योतिषी ने उसे पकड़ लिया। हालांकि, वह उसके लिए बहुत उपयोगी थी क्योंकि वह अच्छी भविष्यवाणी कर लेती थी। उसके इस तरह के आकलन से प्रसन्न होकर ज्योतिषी ने उसका नाम एस्ट्रो रखा और उसे एक पिंजरे में कैद कर दिया। एक दिन पिंजरा खुला होने की वजह से उसे भागने का मौका मिला, लेकिन भागने के दौरान वह एक शिकारी के गुलेल द्वारा जख्मी हो गई। आगे पढें
 

पोटली


स्वामी डोलडाल

मंदाकिनी नदी के किनारे चित्रकूट वन में एक बूढ़ी, बदसूरत और गरीब औरत रहती थी। वह बहुत ही दयालु और उदार स्वभाव की थी, लेकिन उसकी बदसूरती के कारण वहाँ के लोग उसे पसंद नहीं करते और हीन भाव से उसे कुरूपा बुलाते थे। अपने साथ इतने अधिक भेदभाव और घृणा के कारण वह नदी के किनारे प्रायः एकांत में बैठी रहती थी।
एक दिन कल्पतारा नामक एक साधू नदी किनारे पानी पीने आये हुए थे कि अचानक एक शिकारी की गलती से हिरण के जगह स्वयं शिकार बन गये। बूढ़ी कुरूपा कुछ दूरी पर बैठे ये सब देख रही थी। साधू को आहत देख दौड़कर उनकी मदद के लिए आई। वह उन्हें एक सुरक्षित स्थान पर ले गई, पानी पिलाया और उनका आवश्यक उपचार करने में जुट गई, लेकिन साधू कल्पतारा ने बताया कि उनका अंतिम समय आ चुका है, इसलिए परेशान ना होने का आश्वासन दिया और कुरूपा की सेवा से प्रसन्न होकर कल्पतारा ने उसे बताया कि वह भविष्य में लबनिका अप्सरा के रूप में अपने कोमल वाणी और संुदरता के लिए काफी सराही जायेगी साथ ही अंतिम सांस लेने से पहले उन्होंने ने यह भी कहा कि उसका पुर्नजन्म भगवान इंद्र के राजदरबार में होगा।
इन वरदानों को देकर कल्पतारा चल बसे। कुरूपा को अंततः उदारता प्राप्त हुई। कल्पतारा से वरदान मिलने के बाद कुरूपा ने अपने आत्मा का शरीर से त्याग केवल इस वजह से किया जिससे कि बिना किसी रूकावट के उसका पुनर्जन्म भगवान इन्द्र के राजदरबार में लबनिका के रूप में हो जाये। लबनिका इन्द्रदरबार में दूसरी अप्सराओं की तुलना में सुंदर होने के साथ-साथ उसकी वाणी में भी मधुरता थी। वह साम्राज्य की पहचान थी और उसकी आवाज ने सभी के कानों को मंत्रमुग्ध कर दिया था। लेकिन सुंदरता और मधुर वाणी की वजह से उसमें अहंकार आ चुका था जो कि समय के साथ बढ़ता ही चला गया। वह उन सभी का मजाक उड़ाती जिन्हें वो सम्मान योग्य नहीं मानती।
एक दिन, जब वह गंगोत्री नदी के किनारे विहार कर रही थी तो उसे ऋषि चंद्रकेतु दिखाई दिये। अपनी स्वभाव के अनुरूप उनका सम्मान न करके, उन्हें लज्जित करना चाहा। उसने न केवल ऋषि का मजाक उड़ाया बल्कि उनकी साधना में भी व्यवधान उत्पन्न करने की कोशिश की। इस अभद्र आचरण से परेशान होकर ऋषि चंद्रकेतु ने उसे यथोचित श्राप दिया। उसके सुंदर शरीर को श्रापित तोते में बदलकर ऋषि ने उसके अहंकार को दंडित किया जिससे उसकी सुंदरता और मधुर वाणी क्षणभर में धुआँ के समान ओझल हो गई।
श्रापित होने से लबनिका अपने अतीत के बारे में भूल चुकी थी, जिसमें उसका राजदरबार के अप्सरा से लेकर ऋषि चन्द्रकेतु द्वारा श्रापित तोते तक का सफर शामिल था। उसका जीवन तब और अंधकारमय हो गया जब एक ज्योतिषी ने उसे पकड़ लिया। हालांकि, वह उसके लिए बहुत उपयोगी थी क्योंकि वह अच्छी भविष्यवाणी कर लेती थी। उसके इस तरह के आकलन से प्रसन्न होकर ज्योतिषी ने उसका नाम एस्ट्रो रखा और उसे एक पिंजरे में कैद कर दिया। एक दिन पिंजरा खुला होने की वजह से उसे भागने का मौका मिला, लेकिन भागने के दौरान वह एक शिकारी के गुलेल द्वारा जख्मी हो गई। जख्म गहरा होने की वजह से उसका नियंत्रण बिगड़ गया और वह असंतुलित अवस्था में ऋषि बहुला के आश्रम में जा गिरी।
ऋषि बहुला एक प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। वे अतीत, वत्र्तमान और भविष्य की घटनाओं को आसानी से देख सकते थे। किशोर अवस्था में उन्होंने अपने माता-पिता से लबनिका की कहानियाँ सुनी थी। तब से वे लबनिका में महान प्रषंसकों में से एक थे। जख्मी तोते को देखकर ऋषि को जल्द ही समझ में आ गया कि ये कोई और नहीं बल्कि लबनिका अप्सरा ही अपने श्रापित रूप में है।
भूत और भविष्य के साथ-साथ एस्ट्रो के विकास की भविश्यवाणी भी कर सकते थे। लबनिका के महान प्रशंसक होने के नाते उन्होंने एस्ट्रो को अपनी सारी दिव्य शक्तियां प्रदान की जिसेसे एस्ट्रो न केवल मृत्यु से बच निकली अपितु निश्चित समय के लिए फिर से एक सुदर महिला रूपी मानव तोते में परिवर्तित हो गई।
पुराने श्राप की वजह से उसके चेहरे का आकार नहीं बदला था। ऋषि बहुला भलीभाँती जानते थे कि वे लबनिका के लिए इससे ज्यादा और कुछ नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने संभवतः उसे सही रास्ते का मार्गदर्षन कर स्वामी डोलडाल के बारे में अवगत कराया और उन्हें ढूँढने को कहा। इस तथ्य को जानकर कि वह मूल रूप (लबनिका) को प्राप्त कर सकती है, एस्ट्रो ने ऋषि बहुला का आर्शीवाद लिया और स्वामी डोलडाल की तलाश में आश्रम से निकल गई।
एस्ट्रो, ऋषि बहुला द्वारा मार्गदर्शित रास्ते पर निकल चुकी थी। उसने अपनी खोज केवल स्वामी डोलडाल नामक व्यक्ति की तलाश मंे शुरू नहीं की, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की तलाश शुरू की जिसके पास उसके समस्याओं का समाधान था। पहली बार, वह न तो अभिमानी थी और न ही परेशान, बस आशावान थी।
कुछ दिनों के बाद उसने लबोटा के साथ स्वामी डोलडाल को देखा। यही लबोटा भविष्य में एस्ट्रो का बदमाश और सहभागीदार होगा। तब से वह स्वामी डोलडाल और लबोटा के साथ रहते हुए सदियाँ गुजार चुकी है। उनके आस-पास के हालात में काफी बदलाव आया लेकिन लबोटा और एस्ट्रो के बीच दोस्ती कम न हुई। हालांकि, एस्ट्रो की अभी भी “लबनिका“ का चेहरा प्राप्त करने की कोशिश लगातार जारी है।